उद्धव-गोपी संवाद भाग १

उद्धव संदेश · 9 padas

सुनौ गोपी हरि कौ संदेस करि समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनकौ उपदेस ॥ वै अविगत अविनासी पूरन, सब-घट रहे समाइ । तत्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीं है, बेद पुराननि गाइ ॥ सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इस चित इक मन लाइ । वह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रह्म तब आइ ॥ दुसह सँदेस सुनत माधौ को, गोपी जन बिलखानी । सूर बिरह की कौन चलावै, बुड़तिं मनु बिनु पानी ॥1॥

Pada 1

परी पुकार द्वार गृह-गृह तैं, सुनी सखी इक जोगी आयौ । पवन सधावन, भवन छुड़वन, रवन-रसाल, गोपाल पठायौ ॥ आसन बाँधि, परम ऊरध चित, बनत न तिनहिं कहा हित ल्यायौ । कनक बेलि , कामिनि ब्रजबाला, जोग अगिनि दहिबे कौं धायौ ॥ भव-भय हरन, असुर मारन हित, कारन कान्ह मधुपुरी छायौ । ब्रज मै जादव एकौ नाहीं, काहैं उलटौ जस बिथरायौ ॥ सुथल जु स्याम धाम मैं बैठौ, अबलनि प्रति अधिकार जनायौ ॥ सूर बिसारी प्रीति साँवरै, भली चतुरता जगत हँसायौ ॥2॥

Pada 2

देन आए ऊधौ मत नीकौ । आवहु री मिलि सुनहु सयानी, लेहु सुजस कौ टीकौ ॥ तजन कहत अंबर आभूषन, गेह नेह सुत ही कौ । अंग भस्म करि सीस जटा धरि,सिखवत निरगुन फीकौ ॥ मेरे जान यहै जुवतिनि कौ, देत फिरत दुख पी कौ । ता सराप तें भयौ स्याम तन, तउ न गहत डर जी कौ ॥ जाकी प्रकृति परी जिय जेसी, सोच न भली बुरी कौ । जैसैं सूर ब्याल रस चाखैं, मुख नहिं होत अमी कौ ॥3॥

Pada 3

प्रकृति जो जाकैं अंग परी । स्वान पूँछ कोउ कोटिक लागै, सूधी कहुँ न करी ॥ जैसें काग भच्छ नहिं छाँड़ै, जनमत जौन घरी । धौए रंग जात नहिं कैसेहुँ, ज्यौं कारी कमरी ॥ ज्यौं अहि डसत उदर नहिं पूरत, ऐसी धरनि धरी । सूर होइ सो होइ सोच नहिं, तैसेइ एऊ री ॥4॥

Pada 4

समुझि न परति तिहारो ऊधौ । ज्यौं त्रिदोष उपजैं जक लागत, बोलत बचन न सूधौ ॥ आपुन कौ उपचार करो अति, तब औरनि सिख देहु । बड़ौ रोग उपयौ है तुमकौं भवन सबारैं लेहु । ह्वाँ भेषज नाना बाँतिन के, अरु मधु-रिपु से बैद । हम कातर डरपतिं अपनै सिर, यह कलंक है खेद ॥ साँची बात छाँड़ि अलि तेरी, झूठी को अब सुनिहै । सूरदास मुक्ताहल भोगी, हंस ज्वारि क्यौं चुनिहै ॥5॥

Pada 5

ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी । जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं ॥ जैसे सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी । अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी ॥ ज्यौं दरपन मैं दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी । तैसैं सूर मिले हरि हमकौं, बिरह-बिथा तन त्यागी ॥6॥

Pada 6

(अलि हौं) कैसैं कहौं हरि के रूप रसहिं । अपने तन मैं भेद बहुत बिधि, रसना जानै न नैन दसहिं ॥ जिन देखे ते आहिं बचन बिनु, जिनहिं बचन दरसन न तिसहिं । बिनु बानी ये उमँगि प्रेम जल, सुमिरि-सुमिरि वा रूप जसहिं ॥ बार-बार पछितात यहै कहि, कहा करौं जो बिधि न बसहिं । सूर सकल अँगनि की गति, क्यौं समुझावैं छपद पसुहिं ॥7॥

Pada 7

हम तौ सब बातनि सचु पायौ । गोद खिलाइ पिवाइ देह पय, पुनि पालनै झुलायौ ॥ देखति रही फनिग की मनि ज्यौं, गुरुजन ज्यौं न भुलायौ । अब नहिं समुजति कौन पाप तै, बिधना सो उलटायौ ॥ बिनु देखैं पल-पल नहिं छन-छन, ये ही चित ही चायौ । अबहिं कठोर भए ब्रजपति-सुत, रोवत मुँह न धुवायौ ॥ तब हम दूध दही के कारन, घर घर बहुत खिझायौ । सो सब सूर प्रगट ही लाग्यौ , योगऽरु ज्ञान पठायौ ॥8॥

Pada 8

मधुकर कहिऐ काहि सुनाइ । हरि बिछुरत हम जिते सहे दुख, जिते बिरह के धाइ ॥ बरु माधौ मधुबन ही रहते, कत जसुदा कैं आए । कत प्रभु गोप-बेष ब्रज धरि कै, कत ये सुख उपजाए ॥ कत गिरि धर्‌यौ, इन्द्र मद मेट्यौ, कत बन रास बनाए । अब कहा निठुर भए अबलनि कौं, लिखि लिखि जोग पठाए ॥ तुम परबीन सबे जानत हौ, तातैं यह कहि आई । अपनी को चालै सुनि सूरज, पिता जननि बिसराई ॥9॥

Pada 9

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