उद्धव-गोपी संवाद भाग २

उद्धव संदेश · 11 padas

जानि करि बावरी जनि होहु । तत्व भजै वैसी ह्वै जैहौ, पारस परसैं लोहु ॥ मेरौ बचन सत्य करि मानौ, छाँड़ौ सबकौ मोहु । तौ लगि सब पानी की चुपरी, जौ लगि अस्थित दोहु ॥ अरे मधुप ! बातैं ये ऐसी, क्यौं कहि आवतिं तोह । सूर सुबस्ती छाड़ि परम सुख, हमैं बतावत खौह ॥1॥

Pada 1

ऊधौ हरि गुन हम चकडोर । गुन सौं ज्यौं भावै त्यौं फेरौ, यहे बात कौ ओर ॥ पैड़ पैंड़ चलियै तो चलियै, ऊबट रपटै पाइँ । चकडोरी की रीति यहै फिरि, गुन हीं सौं लपटाइ ॥ सूर सहज गुन ग्रंथि हमारैं, दई स्याम उर माहीं । हरि के हाथ परै तौ छूटै, और जतन कछु नाहिं ॥2॥

Pada 2

उलटी रीति तिहारी ऊधौ, सुनै सो ऐसी को है । अलप बयस अबला अहीरि सठ, तिनहीं जोग कत सोहे ॥ बूचि खुभी, आँधरी काजर, नकटी पहिरै बेसरि । मुड़ली पटिया पारौ चाहै, कोढ़ी लावै केसरि ॥ बहिरी पति सौ मतौ करै तौ, तैसोइ उत्तर पावै । सो गति होइ सबै ताकी जो ,ग्वारिनि जोग सिखावै ॥ सिखई कहत स्याम की बतियाँ, तुमकौं नाहीं दोष । राज काज तुम तैं न सरैगो, काया अपनी पोष ॥ जाते भूलि सबै मारग मैं, इहाँ आनि का कहते । भली भई सुधि रही सूर, नतु मोह धार मैं बहते ॥3॥

Pada 3

अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी । देख्यौ चाहतिं कमलनैन कौं, निसि-दिन रहतिं उदासी ॥ आए ऊधौ फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी । केसरि तिलक मोतिनि की माला, बृंदावन के बासी ॥ काहु के मन की कोउ जानत, लोगनि के मन हाँसी । सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, करवट लेहौं कासी ॥4॥

Pada 4

जब तैं सुंदर बदन निहार्‌यौ । ता दिनतैं मधुकर मन अटक्यौ, बहुत करी निकरै न निकार्‌यौ ॥ मातु, पिता, पति, बंधु, सुजन नहिं, तिनहूँ कौ कहिबौ सिर धार्‌यो । रही न लोक लाज निरखत, दुसह क्रोध फीकौ करि डार्‌यौ ॥ ह्वैबौ होइ सु होइ सु होइ कर्मबस, अब जी कौ सब सोच निवार्‌यौ । दासी भई जु सूरदास प्रभु, भलौ पोच अपनौ न विचार्‌यौ ॥5॥

Pada 5

और सकल अँगनि तैं ऊधौ, अँखियाँ अधिक दुखारी । अतिहिं पिरातिं सिरातिं, न कबहूँ, बहुत जतन करि हारी ॥ मग जोवत पलकी नहिं लावतिं, बिरह बिकल भइँ भारी । भरि गइ बिरह बयारि दरस बिनु, निसि दिन रहतिं उघारी ॥ ते अलि अब ये ज्ञान सलाकैं, क्यौं सहि सकतिं तिहारी । सूर सु अंजन आँजि रूप रस, आरति हरहु हमारी ॥6॥

Pada 6

उपमा नैन न एक रही । कवि जन कहत कहत सब आए, सुधि कर नाहिं कही ॥ कहि चकोर बिधु मुख बिनु जीवत , भ्रमर नहीं उड़ि जात । हरि-मुख कमल कोष बिछुरे तैं, ठाले कत ठहरात ॥ ऊधौ बधिक ब्याध ह्वै आए, मृग सम क्यौं न पलात । भागि जाहिं बन सघन स्याम मैं , जहाँ न कोऊ घात ॥ खंजन मन-रंजन न होहिं ये, कबहुँ नहीं अकुलात । पंख पसारि न होत चपल गति, हरि समीप मुकुलात ॥ प्रेम न होइ कौन बिधि कहियै, झूठैं हीं तन आड़त । सूरदास मीनता कछू इक, जल भरि कबहुँ न छाँड़त ॥7॥

Pada 7

ऊधौ अँखियाँ अति अनुरागी । इकटक मग जोवतिं अरु रोवतिं, भूलेहुँ पलक न लागी ॥ बिनु पावस पावस करि राखी, देखत हौ बिदमान । अब धौं कहा कियौ चाहत हौ, छाँड़ौ निरगुगन ज्ञान ॥ तुम हौ सखा स्याम सुंदर के, जानत सकल सुभाइ । जैसैं मिलै सूर के स्वामी, सोई करहु उपाइ ॥8॥

Pada 8

सब खौटे मधुबन के लोग । जिनके संग स्याम सुंदर सखि, सीखे हैं अपजोग ॥ आए हैं ब्रज के हित ऊधौ, जुवतिनि कौ लै जोग । आसन, ध्यान नैन मूँदे सखि, कैसैं कढ़ै वियोग ॥ हम अहीरि इतनी का जानैं, कुबिजा सौं संजोग । सूर सुवैद कहा लै कीजै, कहैं न जानै रोग ॥9॥

Pada 9

मधुबन लोगनि को पतियाइ । मुख औरे अंतरगत औरे, पतियाँ लिखि पठवत जु बनाइ ॥ ज्यौं कोइल सुत-काग जिवावै, भाव भगति जु खवाइ । कुहुकि कुहुकि आऐं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाइ ॥ ज्यौं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातैं आइ । सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाइ ॥10॥

Pada 10

आए जोग सिखावन पाँड़े । परमारथी पुराननि लादे, ज्यौं बनजारे टाँड़े ॥ हमरे गति-पति कमल-नयन की, जोग सिखें ते राँड़े । कहौ मधुप कैसे समाहिंगे, एक म्यान दो खाँडे ॥ कहु षट्पद कैसें खैयतु है, हाथिनि कैं सँग गाँड़े ॥ काकी भूख गई बयारि भषि, बिना दूध घृत माँड़े । काहे कौं झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े ॥ सूरदास तीनौ तहिं उपजत, धनिया, धान कुम्हाड़े ॥11॥

Pada 11

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