उद्धव-गोपी संवाद भाग ३

उद्धव संदेश · 16 padas

ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीं । घट घट व्यापक दारु अगिनि ज्यौं, सदा बसै उर माहीं ॥ निरगुन छाँड़ी सगुन कौं दौरतिं, सुधौं कहौ किहिं पाहीं । तत्व भजौ जो निकट न छूटै, ज्यौं तनु तैं परछाहीं ॥ तिहि तें कहौ कौन सुख पायौ, जिहिं अब लौं अवगाहीं । सूरदास ऐसैं करि लागत, ज्यौं कृषि कीन्हें पाही ॥1॥

Pada 1

ऊधो कही सु फेरि न कहिऐ । जौ तुम हमैं जिवायौ चाहत, अनबोले ह्वै रहिए ॥ प्रान हमारे घात होत है, तुम्हारे भाऐं हाँसी । या जीवन तैं मरन भलौ है, करवट लैहैं कासी ॥ पूरब प्रीति सँभारि हमारी, तुमकौं कहन पठायौ । हम तौ जरि बरि भस्म भईं तुम आनि मसान जगायौ ॥ कै हरि हमकौं आनि मिलावहु, कै लै चलिये साथै । सूर स्याम बिनु प्रान तजति हैं, दोष तुम्हारे माथैं ॥2॥

Pada 2

घर ही के बाढ़े रावरे । नाहिन मीत-वियोग बस परे, अनब्यौगे अलि बावरे ॥ बरु मरि जाइ चरैं नाहिं तिनुका, सिंह को यहै स्वभाव रे । स्रवन सुधा-मुरली के पोषे, जोग जहर न खवाब रे ॥ ऊधौ हमहिं सीख कह दैहौ, हरि बिनु अनत न ठाँव रे । सूरदास कहा लै कीजै, थाही नदिया नाव रे ॥3॥

Pada 3

हमकौं हरि कौ कथा सुनाउ । ये आपनी ज्ञान गाथा अलि, मथुरा ही लै जाउ ॥ नागरि नारि भलैं समझैंगी, तेरौ बचन बनाउ । पा लागौं ऐसी इन बातनि, उनही जाइ रिझाउ ॥ जौ सुचि सखा स्याम सुंदर कौ, अरु जिय मैं सति भाउ । तौ बारक आतुर इन नैननि, हरि मुख आनि दैखाउ ॥ जौ कोउ कोटि करै, कैसिहूँ बिधि, बल विद्या व्यवसाउ । तउ सुनि सूर मीन कौं जल बिनु, नाहिं न और उपाउ ॥4॥

Pada 4

ऊधौ बानी कौन ढरैगौ, तोसैं उत्तर कौन करेगौ । या पाती के देखत हीं अब, जल सावन कौ नैन ढरैगौ । बिरह-अगिनि तन जरत निसा-दिन, करहिं छुवत तुव जोग जरैगौ । नैन हमारे सजल हैं तारे, निखत ही तेरौ ज्ञान गरैगौ ॥ हमहिं वियोगऽरु सोग स्याम कौ, जोग रोग सौं कौन अरैगौ । दिन दस रहौ जु गोकुल महियाँ, तब तेरौ सब ज्ञान मरैगौ ॥ सिंगी सेल्ही भसमऽरु कंथा, कहि अलि काके गरैं परैगौ । जे ये लट हरि सुमननि गूँधीं, सीस जटा अब कौन धरैगौ ॥ जोग सगुन लै जाहु मधुपुरी, ऐसे निरगुन कौन तरैगो । हमहिं ध्यान पल छिन मोहन कौं, बिन दरसन कछुवै न सरैगौ ॥ निसि दिन सुमिरन रहत स्याम कौ, जोग अगिनि मैं कौन जरैगौ । कैसैंहु प्रेम नेम मोहन कौं, हित चित तैं हमरैं न टरैगौ । नित उठि आवत जोग सिखावन, ऐसी बातनि कौन भरैगौ । कथा तुम्हारी सुनत न कोऊ, ठाढ़े ही अब आप ररैगौ ॥ बादिहिं रटत उठत अपने जिय, को तोसौं बेकाज लरैगौ । हम अँग अँग स्याम रँग भीनी, को इन बातनि सूर डरैगौ ॥5॥

Pada 5

ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारौ ता पाछैं यह सिद्ध आपनी, जोग कथा बिस्तारौ ॥ जा कारन तुम पठए माधौ सो सोचौ जिय माहीं । केतिक बीच बिरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ॥ तुम परवीन चतुर कहियत हौ, संतत निकट रहत हौ । जल बूड़त अवलंब फेन कौ, फिरि फिरि कहा सकत हौ ॥ वह मुसकान मनोहर चितवनि, कैसैं उर तैं टारौं । जोग जुक्ति अरु मुक्ति परम निधि, वा मुरली पर वारौं ॥ जिहिं उर कमल-नयन जु बसत हैं, तिहिं निरगुन क्यौं आवै । सूरदास सो भजन बहाऊँ, जाहि दूसरौ भावै ॥6॥

Pada 6

ऊधौ हरि काहे के अंतरजामी । अजहुँ न आइ मिलत इहँ अवसर, अवधि बतावत लामी ॥ अपनी चोप आइ उड़ि बैठत, अलि ज्यौं रस के कामी । तिनकौ कौन परेखौ कीजौ, जे हैं गरुड़ के गामी ॥ आई उघरि प्रीति कलई सी, जैसी खाटी आमी । सूर इते पर अनखनि मरियत, ऊधौ पीवत मामी ॥7॥

Pada 7

निरगुन कौन देस कौ बासी ? मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बूझतिं साँचि न हाँसी ॥ कौ है जनक कौन है जननी, कौन नारि को दासी ? कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ? पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी । सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ, सूर सबै मति नासी ॥8॥

Pada 8

कहियौ ठकुराइति हम जानी । अब दिन चारि चलहु गोकुल मैं, सेवहु आइ बहुरि रजधानी ॥ हमकौं हौंस बहुत देखन की, संग लियैं कुबिजा पटरानी । पहुनाई ब्रज कौ दधि माखन, बड़ौ पलँग, अरु तातौ पानी ॥ तुम जनि डरौ उखल तौ तोर्‌यौ, दाँवरिहू अब भई पुरानी । वह बल कहाँ जसोमति कैं कर , देह रावरैं सोच बुढ़ानी ॥ सुरभी बाँटि दई ग्वालनि कौं, मोर-चंद्रका सबै उड़ानी । सूर नंद जू के पालागौं, देखहु आइ राधिका स्यानी ।9॥ सुनि सुनि ऊधौ आवति हाँसी । कहँ वै ब्रह्मादिक के ठाकुर, कहाँ कंस की दासी ॥ इंद्रादिक की कौन चलावै; संकर करत खवासी । निगम आदि बंदीजन जाके, सेष सीस के बासी ॥ जाकैं रमा रहति चरननि तर, कौन गनै कुविजा सी । सूरदास-प्रभु दृढ़ करि बाँधे, प्रेम-पुंज की पासी ॥10॥

Pada 9

काहे कौं गोपिनाथ कहावत । जौ मधुकर वै स्याम हमारे, क्यौं न इहाँ लौं आवत ॥ सपने की पहिचानि मानि जिय, हमहिं कलंक लगावत । जो पै कृष्न कूबरी रीझे, सोइ किन बिरद बुलावत । ज्यौं गजराज काज के औरै, औरे दसन दिखावत । ऐसैं हम कहिबे सुनिबे कौं , सूर अनत बिरमावत ॥11॥

Pada 10

साँवरौ साँवरी रैनि कौ जायौ । आधी राति कंस के त्रासनि, बसुद्यौ गोकुल ल्यायौ ॥ नंद पिता अरु मातु जसोदा, माखन मही खवायौ । हाथ लकुट कामरि काँधे पर,बछरुन साथ डुलायौ ॥ कहा भयौ मधुपुरी अवतरे, गोपीनाथ कहायौ । ब्रज बधुअनि मिलि साँट कटीली, कपि ज्यौं नाच नचायौ ॥ अब लौं कहाँ रहे हो ऊधौ, लिखि-लिख जोग पठायौ । सूरदास हम यहै परेखौ, कुबरी हाथ बिकायौ ॥12॥

Pada 11

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै । मूरी के पातनि के बदलैं, कौ मुक्ताहल देहै ॥ यह व्यौपार तुम्हारो ऊधौ, ऐसैं ही धर्‌यौ रैहै । जिन पै तैं लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै ॥ दाख छाँड़ि के कटुक निबौरी, को अपने मुख खैहै । गुन करि मोही सूर सावरैं, को निरगुन निरबैहै ॥13॥

Pada 12

मीठी बातनि मैं कहा लीजै । जौ पै वै हरि होहिं हमारे, करन कहैं सोइ कीजै ॥ जिन मोहन अपनैं कर काननि, करनफूल पहिराए । तिन मोहन माटी के मुद्रा, मधुकर हाथ पठाए ॥ एक दिवस बेनी बृंदावन, रचि पचि बिबिध बनाइ । ते अब कहत जटा माथे पर, बदलौ नाम कन्हाइ ॥ लाइ सुगंध बनाइ अभूषन, अरु कीन्ही अरधंग । सो वै अब कहि-कहि पठवत हैं, भसम चढ़ावन अंग ॥ हम कहा करैं दूरि नँद-नंदन, तुम जु मधुप मधुपाती । सूर न होहिं स्याम के मुख को, जाहु न जारहु छाती ॥14॥

Pada 13

ऊधौ तुम हौ निकट के बासी । यह निरगुन लै तिनहिं सुनावहु, जे मुड़िया बसैं कासी ॥ मुरलीधरन सकल अँग सुंदर, रूप सिंधु की रासी । जोग बटोरे लिए फिरत हौ, ब्रजवासिन की फाँसी ॥ राजकुमार भलैं हम जाने, घर मैं कंस की दासी । सूरदास जदुकुलहिं लजावत, ब्रज मैं होति है हाँसी ॥15॥

Pada 14

जा दिन तैं गोपाल चले । ता दिन तैं ऊधौ या ब्रज के,सब स्वभाव बदले ॥ घटे अहार विहार हरष हित, सुख सोभा गुन गान । ओज तेज सब रहित सकल बिधि, आरति असम समान ॥ बाढ़ी निसा, बलय आभूषन, उन-कंचुकी उसास । नैननि जल अंजन अंचल प्रति,आवन अवधि की आस ॥ अब यह दसा प्रगट या तन की, कहियौ जाइ सुनाइ । सूरदास प्रभु सो कीजौ जिहिं, बेगि मिलहिं अब आइ ॥16॥

Pada 15

हम तौ कान्ह केलि की भूखी । कहा करैं लै निर्गुन तुम्हरौ, बिरहिन विरह बिदूषी ॥ कहियै कहा यहै नहिं जानत, कहौ जोग किहि जोग । पालागौं तुमहीं से वा पुर, बसत बावरे लोग ॥ चंदन अभरन, चीर चारू बर, नेकु आपु तन कीजै । दंड, कमंडल, भसम, अधारी, तब जुवतिनि कौं दीजै ॥ सूर देखि दृढ़ता गोपिन की, ऊधौ दृढ़ ब्रत पायौ । करी कृपा जदुनाथ मधुप कौं, प्रेमहिं पढ़न पठायौ ॥17॥

Pada 16

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