राधा कृष्ण मिलन

द्वारिका चरित · 5 padas

हरि सौं बूझति रुकमिनि इनमैं को बृषभानु किसोरी । बारक हमै दिखावहु अपने, बालापन की जोरी ॥ जाकौ हेत निरंतर लीन्हे, डोलत ब्रज की खोरी । अति आतुर ह्वै गाइ दुहावन, जाते पर-घर चोरी ॥ रचते सेज स्वकर सुमननि की, नव-पल्लव पुट तोरी । बिन देखैं ताके मन तरसै, छिन बीतै जुग कोरी ॥ सूर सोच सुख करि भरि लोचन, अंतर प्रीति न थोरी । सिथिल गात मुख बचन नहिं, ह्वै , जु गई मति भोरी ॥1॥

Pada 1

बूजति है रुकमनि हिय इनमैं को बृषभानु किसोरी । नैंकु हमैं दिखरावहु अपनी बालापन की जोरी ॥ परम चतुर जिन कीन्हे मोहन, अल्प बैस ही थोरी । बारे तै जिहिं यहै पढ़यौ, बुधि बल कल बिधि चोरी । जाके गुन गनि ग्रंथित माला, कबहुँ न उर तैं छोरी । मनसा सुमिरन, रूप ध्यान उर, दृष्टि न इत उत मोरी । वह लखि-जुवति वृंदा मैं ठाढ़ी, नील बसन तन गोरी । सूरदास मेरौ मन वाकी, चितवनि बंक हर्यौ री ॥2॥

Pada 2

रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी । जैसैं बहुत दिननि की बिछुरी, एक बाप की बेटी ॥ एक सुभाव एक वय दोऊ दोऊ हरि कौं प्यारी । एक प्रान मन एक दुहुनि कौ, तन करि दीसति न्यारी ॥ निज मंदिर लै गई रुकमिनी, पहनाई बिधि ठानी । सूरदास प्रभु तहँ पग धारे, जहँ दोऊ ठकुरानी ॥3॥

Pada 3

हरि जू इते दिन कहाँ लगाए । तबहि अवधि मैं कहत न समुझी, गनत अचानक आए ॥ भली करी जु बहुरि इन नैननि, सुंदर दरस दिखाए । जानी कृपा राज काजहु हम, निमिष नहीं बिसराए ॥ बिरहिनि बिकल बिलोकि सूर, प्रभु, धाइ हृदै करि लाए । कछु इक सारथि सौं कहि पठयौ, रथ के तुरँग छुड़ाए ॥4॥

Pada 4

हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ । जदपि नैन निरखत वह मूरति, फिरि मन जात तहाँ ? मुख मुरली सिर मौर पखौवा, गर घुँघचिनि कौ। आगैं धेनु तन मंडित, तिरछी चितवनि चार ॥ राति दिवस सब सखा लिए सँग, हँसि मिलि खेलत खात । सूरदास प्रभु इत उत चितवत, कहि न सकत कछु बात ।5॥ राधा माधव भेंट भई । राधा माधव, माधव राधा,कीट भृंग गति ह्वैं जु गई ॥ माधव राधा के रँग राँचे, राधा माधव रंग रई । माधव राधा प्रीति निरंतर, रसना करि सो कहि न गई । बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर, यह कहिकै उन ब्रज पठई ॥ सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रज-बिहार नित नई नई ॥6॥

Pada 5

कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट