कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट

द्वारिका चरित · 12 padas

ब्रज बासिन कौ हेतु, हृदय मैं राखि मुरारी । सब जादव सौं कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी ॥ बड़ौ परब रवि-ग्रहन, कहा कहौं तासु बड़ाई । चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयै जाई ॥ तात, मात निज नारि लिए, हरि जू सब संगा । चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा ॥ कुरुच्छेत्र मैं आइ, दियौ इक दूत पठाई । नंद जसोमति गोपि ग्वाल सब सूर बुलाई ॥1॥

Pada 1

हौं उहाँ तेरेहि कारन आयौ । तेरी सौं सुनि जननि जसोदा, मोहिं गोपाल पठायौ ॥ कहा भयौ जो लोग कहत हैं, देवकि माता जायौ । खान-पान परिधान सबै सुख, तैंही लाड़ लड़ायौ ॥ इतौ हमारौ राज द्वारिका, मों जी कछू न भायौ । जब जब सुरति होति उहिं हित की, बिछुरि बच्छ ज्यौं धायौ ॥ अब हरि कुरुछेत्र मैं आए , सो मैं तुम्हैं सुनायौ । सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु, हित करि उहाँ बुलायौ ॥2॥

Pada 2

वायस गहगहात सुनि सुंदरि, बानी बिमल पूर्ब दिसि बोली । आजु मिलावा होइम कौ, तू सुनि सखी राधिका भोली ॥ कुच भुज नैन अधर फरकत हैं, बिनहिं बात अंचल ध्वज डोली । सोच निवारि करौ मन आनँद, मानौ भाग दसा बिधि खोली ॥ सुनत बात सजनी के मुख की, पुलकित प्रेम तरकि गई चोली । सूरदास अभिलाष नंदसुत, हरषी सुभग नारि अनमोली ॥3॥

Pada 3

राधा नैन नीर भरि आए । कब धौं मिलैं स्याम सुंदर सखि, जदपि निकट हैं आए ॥ कहा करौं किहिं भाँति जाहुँ अब, पंख नहीं तन पाए । सूर स्याम सुँदर घन दरसैं तन के ताप नसाए ॥4॥

Pada 4

अब हरि आइहैं जनि सोचै । सुनु बिधुमुखी बारि नैननि तैं, अब तू काहैं मोचे ॥ लै लेखनि मसि लिखि अपने, संदेसहिं छाँड़ि सँकोचे । सूर सु बिरह जनाउ करत कत, प्रबल मदन रिपु पोचै ॥5॥

Pada 5

पथिक, कहियौ हरि सौं यह बात । भक्त बछल बिरद तुम्हारौ, हम सब किए सनाथ ॥ प्रान हमारे संग निहारैं, हमहूँ हैं अब आवत । सूर स्याम सौं कहत सँदेसौ, नैनन नीर बहावत ॥6॥

Pada 6

नंद जसोदा सब ब्रजबासी । अपने-अपने सकट साजिके, मिलन चले अविनासी ॥ कोउ गावत कोउ बेनु बजावत, कोउ उतावल धावत । हरि दरसन की आसा कारन, बिबिध मुदित सब आवत ॥ दरसन कियौ आइ हरि जू कौ, कहत स्वप्न कै साँची । प्रेम मगन कछु सुधि न रही अँग, रहे स्याम रँग राँची ॥ जासौं जैसी भाँति चाहियै, ताहि मिलै त्यौं धाइ । देस-देस के नृपति देखि यह, प्रीति रहे अरगाइ । उमँग्यौ प्रेम समुद्र दुहूँ दिसि, परिमिति कही न जाइ । सूरदास यह सुख सो जानै, जाकैं हृदय समाई ॥7॥

Pada 7

तेरे जीवन मूरि मिलहि किन माई । महाराज जदुनाथ कहावत, तबहिं हुते सिसु कुँवर कन्हाई ॥ पानि परे भुज धरे कमल मुख, पेखत पूरब कथा चलाई । परम उदार पानि अवलोकत, हीन जानि कछु कहत न जाई ॥ फिर-फिरि अब सनमुख ही चितवति, प्रीति सकुच जानी जदुराई । अब हँसि भेंटहु कहि मोहि निज-जन, बाल तिहारौ नंद दुहाई ॥ रोम पुलक गदगद तन तीछन, जलधारा नैननि बरषाई ॥ मिले सु तात, मात, बाँधव सब, कुसल-कुसल करि प्रस्न चलाई । आसन देइ बहुत करी बिनती, सुत धोखै तब बुद्धि हिराई ॥ सूरदास प्रभु कृपा करी अब, चितहिं धरै पुनि करी बड़ाई ॥8॥

Pada 8

माधव या लगि है जग जीतत । जातैं हरि सौं प्रेम पुरातन, बहुरि नयौ करि लीजत ॥ कहँ ह्वाँ तुम जदुनाथ सिंधु तट, कहँ हम गोकुल बासी । वह बियोग, यह मिलन कहाँ अब, काल चाल औरासी ॥ कहँ रबि राहु कहाँ यह अवसर, विधि संजोग बनायौ । उहिं उपकार आजु इन नैननि, हरि दरसन सचुपायौ ॥ तब अरु अब यह कठिन परम अति निमिष पीर न जानी । सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी । सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी ॥9॥

Pada 9

ब्रजबासिनि सौ कह्यौ सबनि तैं ब्रज-हित मेरैं । तुमसौं नाही दूरि रहत हौं निपटहिं नेरैं ॥ भजै मोहिं जो कोइ, भजौं मैं तेहिं ता भाई । मुकुर माहिं ज्यौ रूप, आपनैं सम दरसाई ॥ यह कहि के समदे सकल, नैन रहे जल छाइ । सूर स्याम कौ प्रेम लछु, मो पै कह्यौ न जाइ ॥10॥

Pada 10

सबहिनि तैं हित है जन मेरौं । जनम जनम सुनि सुबल सुदामा, निबहौं यह प्रन बेरौ ॥ ब्रह्मादिक इंद्रादिक तेऊ, जानत बल सब केरौ । एकहिं साँस उसास त्रास उड़ि, चलते तजि निज खेरौ ॥ कहा भयौ जो देस द्वारिका, कीन्हौ दूर बसेरौ । आपुन ही या ब्रज के कारन, करिहौं फिरि फिरि फेरौ ॥ इहाँ उहाँ हम फिरत साधु हित, करत असाधु अहेरौ । सूर हृदय तैं टरत न गोकुल, अंग छुअत हौं तेरौ ॥11॥

Pada 11

हम तौ इतनै हौ सचु पायौ । सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, बहुरौ दरस दिखायौ ॥ कहा भयौ जो लोग कहत हैं, कान्ह द्वारिका छायौ । सुनिकै बिरह दशा गोकुल की, अति आतुर ह्वै धायौ ॥ रजक धेनु गज कंस मारि कै, कीन्हौ जन को भायौ । महाराज ह्वै मातु पिता मिलि, तऊ न ब्रज बिसरायौ ॥ गपि गोपऽरु नंद चले मिलि, समुद्र बढ़ायौ । अपने बाल गुपाल निरखि मुख, नैननि नीर बहायौ ॥ जद्यपि हम सकुचे जिय अपनैं, हरि हित अधिक जनायौ । वैसेइ सूर बहुरि नंदनंदन, घर-घर माखन खायौ ॥12॥

Pada 12

रुक्मिनी कृष्ण संवादराधा कृष्ण मिलन