दोहावली
दोहावली
भाग-12 दोहा संख्या 551 से 573 तक
दोहा संख्या 561 से 573
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।561।
561
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास।562।
562
श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह।
इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह।563।
563
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पुछिहै कौन।564।
564
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
दहन राम गुन ग्राम जिमि ईधन अनल प्रचंड।565।
565
कलि पाषंड प्रचार प्रबल पाप पावँर पतित।
तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल।566।
566
रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ।
राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ।567।
567
बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि।
सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि।568।
568
तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम।
सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम।569।
569
पुरूषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम।
सुलथ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम।570।
570
मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास।
तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास।5711।
5711
का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिऐ साँच।
काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच।572।
572
मनि मानिक महँगे किए सहँगे तृन जल नाज।
तुलसी एते जानिऐ राम गरीब नेवाज।573।
573
(इति गोस्वामी तुलसीदास रचित दोहावली)
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