दोहावली
दोहावली
भाग-12 दोहा संख्या 551 से 573 तक
दोहा संख्या 551 से 560
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ।।551।
551
ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।552।
552
बादहिं सूद द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।553।
553
साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान।
भमति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान।554।
554
श्रुति संमत हरि भगति पथ संजुत बिरति बिबेक।
तेहि परिहरहिं बिमोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।555।
555
सकल धरम बिपरीत कलि कल्पित कोटि कुपंथ।
पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रन्थ।556।
556
धातुबाद निरूपाधि बर सदगुरू लाभ सुभीत।
देव दरस कलि काल में पोथिन दुरे सभीत।557।
557
सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज।
मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज।558।
558
गोंड गंवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल।
साम न दान न भेद कलि केवल दंड कराल।559।
559
फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार।
कायर कूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार।560।
560