दोहावली
दोहावली
भाग-6 दोहा संख्या 251 से 300 तक
दोहा संख्या 261 से 270
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद मुन आगार।
केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।261।
261
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नेन सर को अस लाग न जाहि।262।
262
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।263।
263
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरू लोभ।
मुनि बिग्यान धम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।264।
264
लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।
क्रोध कें परूष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।265।
265
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दाश्न दुखद मायारूपी नारि।266।
266
काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला केहि जग कालु न खाइ।267।
267
जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिं बिचारि।
दारून बैरी मीचु के बिच बिराजति नारि।268।
268
दीपसिखा सम जुबति तनम न जनि होसि पतंग।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।269।
269
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासत्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघपवतिह मूढ़ परे भवकूप।270।
270