दोहावली

दोहावली

भाग-6 दोहा संख्या 251 से 300 तक

दोहा संख्या 271 से 280 ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारूनी कहहु काह उपचार।271।
271
ताहि के संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत माहबस राम बिमुख रति काम।272।
272
कहत कठिन समुझत कठिन साधक कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।273।
273
खल प्रबोध जग सोधमन को निरोध कुलनसोध करह। ते फोकट पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध।274।
274
कोउ बिश्राम कि पव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।275।
275
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।276।
276
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।277।
277
जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास। तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस।278।
278
चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि। प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि।279।
279
रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रूचि रंग।280।
280
Section 6 · 2Section 6 · 4