कवितावली

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भाग-3 अरण्य काण्ड

भाग-3 अरण्य काण्ड प्रारंभ (मारीचानुधावन) पंचबटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए। सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै ‘तलसी’ सब अंग घने छबि छाए।। देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बेैन, ते प्रीतमके मन भाए। हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए।। (इति अरण्य काण्ड )
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