कवितावली

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भाग-5 सुन्दर काण्ड

सुन्दर काण्ड प्रारंभ ( अशोक वन ) बासव-बरून बिधि-बनतें सुहावनो, दसाननको काननु बसंत को सिंगारू सेा। समय पुराने पात परत, डरत बातु, पालत लालत रति-मारके बिहारू सेा।। देखें बर बापिका तड़ाग बागको बनाड, रागबस भो बिरागी पवनकुमारू सो। सीयकी दसा बिलोकि बिटप असोक तर, ‘तुलसी’ बिलोक्यो सो तिलोक-सोक -सारू सो।। मली मेघमाल, बनपाल बिकराल भट, नींके सब काल सींचेैं सुधासार नीरके। मंघनाद तें दुलारो, प्रान तें पियारो बागु, अति अनुरागु जियँ जातुधान धीर कें।। ‘तुलसी’ सो जानि-सुनि, सीयकेा दरसु पाइ, पैठेा बाटिकाँ बजाइ बल रघुबीर कें। बिद्यमान देखत दसाननको काननु सेा । तहस -नहस कियो साहसी समीर कें।।
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