कवितावली

कवितावली

भाग-5 सुन्दर काण्ड

(लंकादहन -5) ( छंद 21 से 25) ‘पावकु, पवनु, पानी, भानु, हिमवानु, जमु, कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं। साहेबु महेसु सदा संकित रमेसु मोहिं, महातप साहस बिरंचि लान्हें मोल हैं। । ‘तुलसी’ तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु, बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं। को है ईस नामको, जो बाम होत मोहूसो को, मालवाल! श्रावरेके बावरे-से बोल हैं।21।’ () भूमि भूमिपाल,ब्यालपालक पताल, नाक-, पाल , लोकपाल जेते, सुभट-समाजु है। कहै मालवान, जातुधानपति! रावरे को मनहूँ अकाजु आनै, ऐसो कौन आजु है।। रामकोहु पावकु, समीरू सीय-स्वासु, कीसु, ईस-बामता बिलोकु, बानरको ब्याजु है। जारत पचारि फेरि-फेरि सो निसंक लंक, जहाँ बाँको बीरू तोसो सूर-सिरताजु है।22।
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