कवितावली

कवितावली

भाग-5 सुन्दर काण्ड

(सीताजी से बिदाईं) (छंद 26से 28) (26) जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम, नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै। मातु! कृपा कीजै, सहिजानि दीजै , सुनि सीय, दीन्ही है असीस चारू चूडामनि छोरि कै।। कहा कहौं तात! देखे जात ज्यों बिहात दिन, बड़ी अवलंब ही , सो चले तुम्ह तोरि कै।। तुलसी सनीर नैन , नेहसो सिथिल बैन, बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै।26।। (27) दिवस छ-सात जात जानिबे न, मातु! धरू, धीर, अरि -अंतकी अवधि रहि थोरिकै। बारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु सानुज कुसल कपिकटकु बटोरि कै।। बचन बिनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि , तुलसी त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै। जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी, कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै।27।। (28) साहसी समीरसुनु नीरनिधि लंघि लखि लंक सिद्धपीठु निसि जागो है मसानु सो । तुलसी बिलोकि महासाहसु प्रसन्न भई, देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो।। बाटिका उजारि, अछधारि मारि, जारि गढ़, भानुकुल भानुको प्रतापभानु-भानु-सो। करत बिलोक लोक-कोकनद, कोक कपि, कहै जामवंत, आयो, आयो हनुमानु सो।28।
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