कवितावली

कवितावली

भाग-5 सुन्दर काण्ड

(सीताजी से बिदाईं) छंद 29से 30) (29) गगन निहारि , किलकारी भारी सुनि, हनुमान पहिचानि भए सानँद सचेत हैं। बूड़त जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो , आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं। ‘जै जै जानकीस जै जै लखन-कपीस’ कहि, कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत-रेत हैं। अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा बालधी फिरावैं, मुख नाना गति लेत है।29। (30) आयो हनुमानु, प्रानहेतु अंकमाल देत, लेत पगधूरि ऐक, चूमत लँगूल हैं। एक बूझैं बार-बार सीय -समाचार , कहैं , पवनकुमारू, भो बिगतश्रम-सूल हैं।। एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल, एक पूजैं बाहु बलमूत तोरि फूल हैं। एक कहैं ‘तुलसी’ सकल सिधि ताकें, जाकें कृपा-पाथनाथ सीतानाथु सानुकूल हैं।30।
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