कवितावली

कवितावली

भाग-6 लंका काण्ड

( झूलना) (4) सुभुजु मारीचु खरू त्रिसिरू दूषनु बालि, दलत जेहिं दूसरो सरू न साँध्यो। आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों , समि संग्रामु दसकंघु काँध्यो।। समुझि तुससीस-कपि-कर्म घर-घर घैरू, बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो। बसत गढ़ बंक, लंकेस नायक अछत, लंक नहिं खात कोउ भात राँध्यो।4। (5) ‘बिस्वजयी’ भृगुनाथ-से बिनु हाथ भए हनि हाथ हजारी। बातुल मातुलकी न सुनी सिख का ‘तुलसी’ कपि लंक न जारी। अजहूँ तौ भलो रघुनाथ मिलें, फिरि बूझिहै, को गज , कौन गजारी। कीर्ति बड़ो, करतूति बड़ो, जन-बात बड़ो, सो बड़ोई बजारी।5।
1
Section 6 · 2Section 6 · 4