कवितावली

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भाग-6 लंका काण्ड

( त्रिजटा का आश्वासन ) त्रिजटा कहति बार-बार तुलसीस्वरीसों, ‘राधौ बान एकहीं समुद्र सातौं सोषिहै। सकुल सँघारि जातुधान -धारि जम्बुकादि, जोगिनी-जमाति कालिकाकलाप तोषिहैं।। राजु दै नेवाजिहैं बजाइ कै बिभीषनै, बजैंगे ब्योम बाजने बिबुध प्रेम पोषिहैं।। कौन दसकंधु, कौन मेधनादु बापुरो, को कुंभकर्नु कीटु, जब रामु रन रोषिहैं’।। () बिनय -सनेह सों कहति सीय त्रिजटासों , पाए कछु समाचार आरजसुवनके। पाए जू, बँधायो सेतु उतरे भानुकुलकेतु, आए देखि -देखि दूत दारून दुवनके।। बदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो, मिटै घटै तमीचर-तिमिर भुवनके। लोकपति-कोक-सोक मुँदे कपि-कोकनद, दंड द्वै रह हैं रघु -आदित-उवनके।।
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