चित्रकूट स्तुति (राग कान्हारा)

विनय पत्रिका

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चित्रकूट स्तुति (राग कान्हारा) स्अब चित चेति चित्रकूटहि चलु। कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, बिलसत बढ़त मोह माया-मलु।। भूमि बिलोकु राम-पद-अंकित, बन बिलोकु रघुबर - बिहारथलु।। सैल-सृंग भवभंग -हेतु लखु, दलन कपट -पाखंड-दंभ-दलु। । जहँ जनमे जग-जनक जगतपनि, बिधि-हरि-हर परिहरि प्रपंच छलु।। सकृत प्रबेस करत जेहि आस्त्रम, बिगत-बिषाद भये परथ नलु।। न करू बिलंब बिचारू चारूमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु। पुत्र सेा जाइ जपहि, जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु।। रामनाम-जप जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु। करिहैं राम भावतैा मनकौ, सुख-साधन, अनयास महाफलु।ं कामदमनि कामता, कलपतरू से जुग-जुग जागत जगतीतलु। तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतिति, प्रीति एकै बलु।।
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