विनयावली(राग विभास)

विनय पत्रिका

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विनयावली (राग विभास) (74) जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव, जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे। करि बिचार, तजि बिकार, भजु उदार रामचंद्र, भद्रसिंधु दीनबंधु, बेद बदत रे।। मोहमय कुहू-निशा बिसाल काल बिपुल सोयो, खोयो से अनूप रूप सुपन जू परे। अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकाश, बासना, सराग मोह-द्वेष निबिड़ तम टरे।। भागे मद-मान चोर जानि जातुधान, काम-क्रेाध-लोभ-छोभ-निकर अपडरे। देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप, ताप त्रिबिधि प्रेम-आप दूर ही करे।। श्रवन सुनि गँभीर, जागे अति धीर बीर, बर बिराग-तोष सकल संत आदरे। तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीव जन बिहालु, भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे।।
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