विनयावली(राग ललित )

विनय पत्रिका

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विनयावली(राग ललित ) (76) खेाटेा खरो रावरो हौं, रावरी सौं, रावरेसों झूठ क्यों कहौंगो, जानो सब ही के मनकी। करम-बचन-हिये, कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि, पानी परे सनकी।। दूसरो , भरोसो नहिं बासना उपासनाकी, बासव, बिरंचि, सुर-नर-मुनिगनकी।। स्वारथके साथी मेरे, हाथी स्वान लेवा देई, काहू तो न पीर, रघुबीर!दीन जनकी।। साँप-सभा साबर लबार भये देव दिब्य, दुसह साँसति कीजै, आगे ही या तनकी। साँचे परौं, पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान,तुलसी चातक आस राम स्यामघन की।।
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