श्रीराम आरती

विनय पत्रिका

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श्रीराम आरती (47) ऐसी आरती राम रघुबीरकी करहि मन। हरन दुखदुंद गोबिेंद आनन्दघन।। अचरचर रूप हरि, सरबगत, सरबदा बसत, इति बासना धूप दीजै। दीप निजबोधगत-कोह-मद-मोह-तम, प्रौढ़ अभिमान चितबृत्ति छीजै।। भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ श्रीरमण परम संतोषकारी। प्रेम तांबूल गत शूल संशय सकल, विपुल भव-बासना-बीजहारी।। अशुभ-शुभकर्म-घृतपुर्ण दशवर्तिका, त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं। भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जगनिवासं।। बिमल हृदि-भवन कृत शांति-पर्यक शुभ, शयन विश्राम श्रीरामराया। क्षमा-करूणा प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया।। एहि आरती-निरत सनकादि, श्रुति , शेष, शिव, देवारिषि, अखिलमुनि तत्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमलमति-दास तुलसी।। (जारी)
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