श्रीरामनाम वन्दना

विनय पत्रिका

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श्रीराम-नाम वन्दना- (राग रामकली) (46) श्रीराम सदा राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढ़ मन, बार बारं। सकल सौभाग्य-सुख-खानि जिय जानि शठ, मानि विश्वास वद वेदसारं।। कोशलेन्द्र नव-नीलकंजाभतनु, मदन-रिपु-कंजहृददि-चंचरीकं। जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभु, समर-भंजन, परम कारूनीकं।। दनुज-वन-धूमधुज, पीन आजानुभुज, दंड-कोदंडवर चंड बानं। अरूनकर चरण मुख नयन राजीव, गुन-अयन, बहु मयन-शोभा-निधानं।। वासनावृंद-कैरव-दिवाकर, काम-क्रोध-मद-कंज-कानन-तुषारं।ं लोभ अति मत्त नागेन्द्र पंचाननं भक्तहित हरण संसार-भारं।। केशवं, क्लेशहं, केश-वंदित पद-द्वंद्व मंदाकिनी-मूलभूतं।। सर्वदानंद-संदोह, मोहपहं, घोर-संसार-पाथोधि-पोतं।। शोक-संदेह-पाथोदपटलानिलं, पाप-पर्वत-कठिन-कुलिशरूपं। संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामप्रद, नाम कलि-कलुष-भंजन अनूपं।। धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पभि संबलं, मूलमिदमेव एकं। भक्ति-वैराग्य-विज्ञान-शम-दान-दम, नाम आधीन साधक अनेकं।। तेन नप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्वं कृतं कर्मजालं। येन श्रीरामनामामृतं पानकृतमनिशमनवद्यमवलोक्य कालं। श्रवपच,खल, भिल्ल, यवनादि हरिलोकगत, नामबल विपुल मति मल न परसी। त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास, असि निसित हरिनाम जपु दासतुलसी।।
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