जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि

Abhilash Battisi — श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी

Verse 2 of 4

(कवित्त) जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि, निशिदिन शीश कौं नवाऊँ रसिकन में। [1] सेवाकुञ्ज मण्डल पुलिन वंशीवट, निधिवन औ समीर धीर विचरौं मगन में॥ [2] लता द्रुम हेरौं राधाकृष्ण कहि टेरौं, रज लपटाऊँ तन में और सुख पाऊँ मन में। [3] एहो राधावल्लभ जू तुमही सों विनती है, जैसें बनै तैसें मोहि राखो वृन्दावन में॥ [4] - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी (कविता) जाति-पाँत, कुल-अभिमान, निशिदिन शीश जो नवम रसिकन नर। [1]. [3] हे राधावल्लभ, विनती है मेरे लाल से, मोहि वृन्दावन में मुझे ऐसे ही रखना.. [4] - श्री चन्द्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजिजाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि