रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं
Abhilash Battisi — श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी
Verse 4 of 4
(कवित्त)
रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं,
लाल हैं चकोर तहाँ राधा मुख चंद हैं। [1]
छवि की मरीचिन सौं सींचत है निस दिन,
कोटि-कोटि रवि-ससि लागैं अति मंद हैं॥ [2]
इक टक रहैं मुख नाम सुख लहैं फिर,
कृपा दृष्टि चहैं सुख रूप नंद-नंद हैं। [3]
जाकौं वेद गावैं मुनि ध्यान हूँ न पावैं,
तै तौ बलि-बलि जावैं हित फँसे प्रेम फंद हैं॥ [4]
- श्री चन्द्रलाल गोस्वामी, भावना पच्चीसी
(कविता) रूप के सरोवर में अली कुमुदावली है, चकोर लाल है, राधा मुख चंद है। [1] छवि की मृगतृष्णा को नित शत बार सींचा जाता है, कोटि-कोटि सूर्य-बहनों को अति धीरे-धीरे रोपा जाता है.. [2] मुख का नाम तो एक ही रहता है, फिर सुख नाम चाहिए, सुख रूप नंद-नंद है। [3] वेदों का गान करने वाले ऋषि को यदि ध्यान की प्राप्ति नहीं होती है, तो वह अपने स्वार्थ के लिए स्वयं को बलिदान कर देता है और प्रेम के जाल में फंस जाता है... [4] - श्री चंद्रलाल गोस्वामी, भावना पचीसी।