राधा नाम को आधार
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 3 of 115
(सवैया)
श्रीवृन्दावन वास दीजिये, आस यहै वृषभानदुलारी। [1]
बंशीवट तट नटनागर संग, करत केलि अवलोकौं प्यारी॥ [2]
ललितकिशोरी हूक उठत ही, फूंकि वंसुरिया की दइ मारी। [3]
दरसन बिन चित विकल रहत अति, राधा हरौ यह वाधा हमारी॥ [4]
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (4)
(सवैया) मुझे श्री वृन्दावन का धाम दो, यही वृषभंडुलारी है। [1]. [3] दरसन बिन चित विकल रहत अति, राधा हरौ यह वध हमारा.. [4] - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (4)