येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 40 of 115
(राग परज)
येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि, रसिया लाल तिहारो। [1]
करुनादीठ नीठ अवलोको, दीनदसा मेरी निरवारो॥ [2]
ललितकिशोरी श्रीवनवीथिन, रेनु बनाय सीस पग धारो। [3]
तरसतहै ब्रज देखनको दृग, याते दुख और कह भारो॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)
(राग परजा) येहो स्वामिनी गजगामिनी मनभामिनी, रसिया लाल तिहारो। [1]. [3] काश मैं ब्रज को देख पाता, दुख से भर देता और कहता... [4] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)