पद रज तज किमि
Abhilash Madhuri — श्री ललित किशोरी देव
Verse 93 of 115
(राग तोड़ी जौनपुरी / राग काफ़ी)
पद रज तज किमि आस करत हो, जोग जग्य तप साधा की। [1]
सुमिरत होय मुख आनन्द अति, जरन हरन दुःख बाधा की॥ [2]
ललित किशोरी शरण सदा रहु, सोभा सिन्धु अगाधा की। [3]
परम ब्रह्म गावत जाको जग, झारत पद रज राधा की॥ [4]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी , विनय (219)
(राग तोडै जौनापुरी/राग कफई) पद रज तज किमी अस करता हो, जोग जग्या तप साध की। [1] मुख की प्रसन्नता अपार, विघ्नों का दुःख सदा मिटता। [2] ललित किशोरी सदैव अपने को समर्पित करती है, सिन्धु का सौन्दर्य अनन्त है। [3] परम ब्रह्म गावत जाको जग, झरत पद रज राधा की.. [4] - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (219)