प्रथम सहचरी भाव हिय

Adivani — श्री रामराय

Verse 1 of 11

कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ निरखि-निरखि सहचरि मुसक्यानी॥ [1] मोर मुकट माथे श्रुति कुण्डल भाल तिलक तन मृगमद सानी। [2] पीताम्बर पटका कटि उपटत हार हिये बनमाल सुहानी॥ [3] चिबुक विन्दु सामल कज्जल चखि रस ताम्बूल लालिमा खानी। [4] मुरली कर जु देत मोहन की रामराय मति गती भुलानी॥ [5] - श्री रामराय जी, आदिवाणी (17) कियौ सिंगार लाल प्यारी, निरखि-निरखि साथी मुस्कान। [1] मोर मुक्त मस्तक श्रुति कुंडल भाल तिलक तन मृगमद शनि। [2] पीताम्बर पताका कटि उपतत हर हिये बनमाल सुहानी.. [3] चिबुक विन्दु सामल काजल चाखि रस ताम्बूल लालिमा खानि। [4] मोहन की रामराय उसे मुरली भूला देती है.. [5] - श्री रामराय जी, आदिवासी (17)
प्रथम सहचरी भाव हिय