प्रथम सहचरी भाव हिय

Adivani — श्री रामराय

Verse 2 of 11

ललित लता मन्दिर के आंगन प्रातसमैं राजत पिय प्यारी। प्रीतम कौ पट पीत प्रिया पै ओढ़ै लाल प्रिया की सारी॥ [1] शिथिल शरीर नखर उर अंकित विथुरी अलकन की छवि न्यारी। उठत अनङ्ग तरङ्गन की दुति अङ्ग अङ्ग रुचि मङ्गलकारी॥ [2] करत विशाखा चमर चतुर इत उत ललिता ठाड़ी लियें झारी। निरखत रामराय दम्पति छवि नैन चकोरी टरत न टारी॥ [3] - श्री रामराय जी, आदिवाणी (10) ललित लता मंदिर के प्रांगण में शुभ रजत पिया प्यारी। प्रिया की साड़ी लाल है. उठा अनंग तरंगगन की दुति अंग अंग रुचि शुभ..[2] विशाखा मोची चतुर है, ललिता बहुत चतुर है। निरखत रामराय युगल छवि नैन चकोरी तरत न तरी.. [3] - श्री रामराय जी, आदिवासी (10)
प्रथम सहचरी भाव हियप्रथम सहचरी भाव हिय