प्रथम सहचरी भाव हिय
Adivani — श्री रामराय
Verse 5 of 11
प्यारी! तोहि कैसै कै मान मनाऊँ।
सब विधि विवश, राजधानी वसि, छदम कदम बहु बात बनाऊँ॥ [1]
गुन-आगर, सागर करुना की, कौन नवीन केलि जो जनाऊँ।
‘श्रीरामराय’ तव पद-पंकज नवि, निपट दीन तन हा-हा खाऊँ॥ [2]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)
प्यारी! तो हम कैसे सहमत हो सकते हैं? सभी वैध लोगों से, राजधानी के निवासियों से, छद्म सौतेली माताओं से विवाह करूँ... [1] यदि गुण हैं, करुणा का सागर है, तो कौन-सा नया शब्दकोष जानूँ? 'श्री राम राय' तव पद-पंकज नवी, निपट दिन तन हा-हा कहाँ.. [2] - श्री राम राय जी, आदिवासी (37)