प्रथम सहचरी भाव हिय

Adivani — श्री रामराय

Verse 4 of 11

प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची। तेरे अधरामृत कौ जह फल, अरुन में अरुन खची॥ [1] दर्पन देखि रूप मोहि मेरौ, मोहिनि सांच जची। चर्वन रामराय को हूं दे, जाकों अधिक रुची॥ [2] - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26) देखो प्रिय, मैरी ने क्या हासिल किया है। तेरे अमृत का फल कहा है अरुण नर खाय अरुण.. [1] मोहिनी सांच काकी दर्पण देखती है। अधिक रुचि हो तो चारवन रामराय को हूण दे दो.. [2] - श्री रामराय जी, आदिवासी (26)
प्रथम सहचरी भाव हियप्रथम सहचरी भाव हिय