जगत प्रीति करि देखी

Ashtadash Pada —

Verse 3 of 16

(राग कल्याण) हरि कौ ऐसोई सब खेल। मृग तृष्णा जग ब्यापि रह्यों है कहूँ बिजौरौ न बेल॥ [1] धन-मद जोवन-मद राज-मद ज्यौं पंछिन में डेल। कहें श्री हरिदास यहै जिय जानौ तीरथ कैसौ मेल॥ [2] - श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (13) (राग कल्याण) हरि कौ ऐसोइ सब खेल। जग भर में फैली मृग की प्यास, बिजोरौ कहूँ या बेल। [1] धन-मद जोवना-मद राजा-मद ज्यों पंचिन में लीन। श्री हरिदास यहाँ क्यों रहते हैं, यह कैसा तीर्थ है? [2] - श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पाद (13)
हरि के नाम कों आलस कत करत है रेहरि के नाम कों आलस कत करत है रे