अष्टादश पद

Ashtadash Pada

· 16 verses · Braj

  1. 1. बंदे, अखतियार भला
  2. 2. हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
  3. 3. जगत प्रीति करि देखी
  4. 4. हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
  5. 5. प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट
  6. 6. जगत प्रीति करि देखी
  7. 7. प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट
  8. 8. जगत प्रीति करि देखी
  9. 9. कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख
  10. 10. कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख
  11. 11. कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख
  12. 12. जगत प्रीति करि देखी
  13. 13. हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
  14. 14. प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट
  15. 15. हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
  16. 16. तिनुका ज्यौं बयार के बस