सजनी नव निकुंज सु केलि
Ashtayami Padavali — श्री हित कमलनैन
Verse 3 of 3
(राग बसंत)
सजनी नव निकुंज सु केलि।
गौर-श्याम तमाल लपटी, सरस आनन्द बेलि॥ [1]
निरखि हरषित रसिक मोहन, पान कृत रस झेलि।
जैश्रीकमलनैंन हित छिन छिन बिहरत, भुजा कंठ सु मेलि॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (180)
(राग बसंत) सजनी नव निकुंज सु केली। गौरा-श्याम तमाल लपटी, सरस आनंद बेलि..[1] प्रसन्नचित्त मोहन को पान का स्वाद बहुत अच्छा लगता था। जयश्री कमलनैन हित छिन-छिन बिहारत, भुज कंठ सु मेलि.. [2] - श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टयामी पदावली (180)