वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 1 of 268

हंस सुता तट बिहरिबौ, करि वृंदावन वास। कुंज-केलि मृदु मधुर रस, प्रेम विलास उपास॥ [1] प्रेम-विलास उपासे रहै इक-रस मन माही। तिहि सुख कौ सुख कहा कहौं, मेरी मति नाहिं॥ [2] 'हित ध्रुव' यह रस अति सरस, रसिकनि कियौ प्रसंस। मुकतनि छाँड़े चुगत नहिं, मानसरोवर हंस॥ [3] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (1) हंस सुता तात बिहारीबौ, कारी वृन्दावन वास। कुंजा-केलि शीतल मधुर रस, प्रेम-विलास उपास.. [1] प्रेम-विलास उपास रहे इका-रस मन माही। इस सुख में किस सुख को कहा जा सकता है, यह मेरा विचार नहीं है.. [2] 'खम्भे मारो', यह रस अति मधुर रसिकानि कियौ प्रश्न। मुक्तिनि छंदै चुगत नहीं, मानसरोवर हंस। [3] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, भजन कुण्डलिया (1)
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