वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 116 of 268

वृन्दावन के बसत ही, अंतर जो करै आनि। तिहि सम सत्रु न और कोऊ, मन बच कै यह जानि॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (50) वृन्दावन ही रहेगा, चाहे कुछ भी कीमत चुकानी पड़े। शत्रु कुआँ नहीं, मन कैसे बचे.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (50)
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