वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 115 of 268
यह सुख समुझन कौं कछू, नाहिंन आन उपाइ।
प्रेम दरीची जौ कबहुँ, सहज कृपा खुलि जाइ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (49)
या खुशी, समझो, कोई कुछ नहीं कह सकता, कोई उपाय नहीं। जब प्रेम प्रिय हो जाता है तो कृपा सहज ही खुल जाती है.. - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, प्रेमावली (49)