वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 118 of 268

(कवित्त) प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत, बिहारी जू कें ‘रौंम-रौंम' लोचन ह्वै जात हैं। [1] ज्यौं-ज्यौं रूप पान करैं निमिष न चैन धरै, त्यौं-त्यौं प्यास बाढ़ै अति क्यौं हू न अघात हैं॥ [2] छबि के तंरगनि में झूलत किसोर पिय, हारत न हेरि-हेरि खरे ललचात हैं। [3] 'हित ध्रुव' आरतमै भयौ भ्रम चाहत ही, मिलै हैं कि नाहिं मन क्यौं हू न पत्यात है॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (51) (कविता) मेरे जीवन की प्यारी सुकुमारी को कौन देखता है, जो बिहारियों की 'रौं-रौं' लोचन बन जाती है। [1] रूप कितना भी झपकाए, विश्राम नहीं, रह-रहकर, प्यास, अभिनंदन, क्यों मैं अधिक नहीं, मुझे चोट नहीं लगती.. [2] छवि की लहरों में झूलते किशोर, न हरे, न बाल, वे ही सच्चे मोह हैं। [3] 'हतो ध्रुव' अर्तमई भयौ माया की इच्छा है, मैंने इसे प्राप्त कर लिया है, इसलिए न तो मैं हूं और न ही पतित हूं.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (51)
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