वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 119 of 268

और देस के बसत ही, अधिक भजन जौ होइ। इहि सम नहिं पूजत तउ, वृन्दावन रहै सोइ॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (52) और शरद ऋतु में देश में अधिक जौ उपलब्ध होता था। यहां आपकी पूजा नहीं होती, वृन्दावन सो रहा है.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (52)
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