वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 168 of 268

कोमल चित्त सब सौं मिलै, कबहूँ कठोर न होइ। निस्प्रेही निर्वैरता, ताकी शत्रु न कोई॥ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (88) हर चीज़ नरम और कोमल है, लेकिन कब कठोर हो जाती है? निःस्वार्थ निर्भयता, ताकि न रहे कोई शत्रु.. - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, वृन्दावन शत लीला (88)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिआज सखि निरख रूप भरि नैन