आज सखि निरख रूप भरि नैन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 172 of 268
(राग विहागरौ)
आज सखि निरख रूप भरि नैंन।
लता ऐंन रचि सैंन मिथुन वर, बोलत अति मृदु बैंन॥ [1]
हँसत जबहि दोउ लसत दसन-दुति, सोभा कहत बनैंन।
'हित ध्रुव' निरखि सहज छवि सीवाँ, मैंन होत मन मैंन॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (91)
(राग विहगरौ) अज सखी निरख रूप भारी नैनन। लता ऐन रचि सं मिथुन वर, बोलत अति मृदु बनन.. [1] हंसत जबहि दोउ लसत दासना-दुति, सोभा कहत बनैनन। 'हित ध्रुव' शुद्ध आत्मा, गर्म दिमाग की सरल छवि है.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (91)