ऐसौ और सनेही कौन
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 183 of 268
(राग कान्हरौ)
प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै।
ऐसौ महँगौ आहि सखी री, कहि धौं सो कैसैं कैं लैयै॥ [1]
लाल-लाड़िली कौ यह सर्वसु, तिहिं रस कौं ललचैयै।
अद्भुत छवि विवि रस की धारा, 'ध्रुव' मन तहाँ न्हवैयै॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98)
(राग कान्हरौ) प्राण दियां यः प्रेम न पइयाई। तुम तो मेरी इतनी प्रिय मित्र हो, मैं तुम्हें इतने दबाव में कैसे ले पाऊंगी.. [1] कौन है मेरी प्यारी बहू, जो तीन-तीन स्वादों से ललचाती है? अद्भुत छवि, विवि रस की धारा, मन 'ध्रुव' नहीं... [2] - श्री हित ध्रुव दास, बयालिस लीला, पद्यावली (98)