आज सखि निरख रूप भरि नैन

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 185 of 268

(राग विहागरौ) सनेही एक विहारी-विहारिनि। एक प्रेम रुचि रचे परस्पर, अद्भुत भाँति निहारिनि॥ [1] तन सौं तन, मन सौं मन, अरुझ्यौ, अरुझनि वारनि-हारनि। यह छबि देखत ही ‘ध्रुव' चित कौं, भूली देह-सँभारनि॥ [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (98) (राग विहगरौ) सनेही एक विहारी-विहारिणी। एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावना जागती है, दृश्य अद्भुत दिखता है.. [1] तन सौं तन, मन सौं मन, अरुझायौ, अरुझनि वरणि-हरनि। इस छवि को देखकर 'ध्रुव' चिंतित हो गए और अपने शरीर को भूल गए.. [2] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (98)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिवृन्दाविपिन प्रणाम करि