वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 186 of 268
वृन्दावन आनन्द घन, सब तें उत्तम आहि।
मोते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (99)
वृन्दावन आनंद से भरा है, सब कुछ दूसरों से बेहतर है। नीचे कुआं तो है नहीं, चरण कैसे लाऊं... - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (99)