आज सखि निरख रूप भरि नैन

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 187 of 268

(राग विहागरौ) आराधहि मन राधा दुलहिनि, जिहिं आराधत लाल विहारी। [1] कुंज-कुंज डोलत सँग लागे, कृपा कटाक्ष करैं सुकुमारी॥ [2] रुचि लै नैननि भौंहनि जोवत, छिन-छिन नवसत करत सँभारी। [3] ‘हित ध्रुव’ अद्भुत प्रीति निहारत, देत सखी सब प्राननि वारी॥ [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (100) (राग विहगरौ) अराधहिं मन राधा दुलहिनी, जिहिं अराधत लाल विहारी। [1] कुंज-कुंज हाथ जोड़ो, कटाक्ष करो सुकुमारी.. [2] रुचि ला नानिनि बौनभनि जोवत, छीना-छिन नवस्त करता साभारी। [3] 'हित ध्रुव' अद्भुत प्रेम दर्शन देता है, जीवन भर का साथ देता है.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, पद्यावली (100)
वृन्दाविपिन प्रणाम करिवृन्दाविपिन प्रणाम करि