वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 203 of 268
(कवित्त)
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के,
जावक सुरंग रँगे मनहि हरत हैं। [1]
‘हित ध्रुव’ रही फबि सुमिलि जेहरि-छबि,
नूपुर रतन-खचे दीप से बरत हैं॥ [2]
रीझि-रीझि सुंदर करनि पर पट धरैं,
आरसी सी लियैं लाल देखिबौ करत हैं। [3]
नख-मनि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज,
चंदनि के जूथ मानौं पायनि परत हैं॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (18)
(कविता) कंचन के चुने हुए चरण कोमल और मधुर हैं, बाहर सुरंग सुंदर हरे रंग से रंगी हुई है। [1] 'हित ध्रुव' सुन्दर सुमिली है, विषैली छवि है, नूपुर रत्न-जवाहरातों से सुसज्जित बारात है.. [2] रीझी-रीझी सुन्दर कर्म पकड़ती है, अरसि सी लियान लाल देखिबौ करती है। [3] कील-मणि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज, चंदन जूठ मनौं पायनि परत हैं.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत 1 (18)