हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 202 of 268
हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की,
नख-सिख रूप ही की बरषा सी होती है। [1]
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा,
दामिनी की लसनी दसन ही की दोती है॥ [2]
'हित ध्रुव' पानिप तरंग-रस छलकत,
ताकि मानौ सहज सिंगार सीवाँ पोति है। [3]
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु,
छिन-छिन औरै और बदन की जोति है॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (15)
हंसानी में नखा-सिख का अमृत रूप फुलानी की छलनी में बारिश की तरह है। [1] केसनी की चंद्रिका की शादी अनुराग घाटा से हुई है, दामिनी की लसनी दासन की एकमात्र दोस्त है.. [2] 'हिट ध्रुव' पानीप तरंग-रस से भरपूर है, जो मनौ को आसानी से सीवान की पोती के रूप में तैयार होने की अनुमति देता है। [3] अति अलबेला प्रिय भूषित भूषण बिनु, छिन-छिन औराई और देह की ज्वाला.. [4] - श्री हित ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (15)