वृन्दाविपिन प्रणाम करि
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 206 of 268
हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी,
रसिक रँगीले लाल कीन्हीं उर-हार सी। [1]
छबि के तमाल लपटानी रूप बेलि मानौं,
हँसनि दसनि फूल फूले सुख-सार सी॥ [2]
नख-सिख जगमगै रौंम-रौंम प्रतिबिंब,
लसत है ऐसैं जैसैं आरसी में आरसी। [3]
'हित ध्रुव' इहि बिधि देखैं सखी चित्र भईं,
चहूँ कोद रही झूमि कंचन की डार सी॥ [4]
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (34)
हिरण की तरह भारी, मधुर, सुंदर, लाल किन्हिन उरा-हर की तरह रंगीन। [1]. [3] 'हित ध्रुव' इहि बिधि देखैन सखी चित्रा भैन, चहुँ रहि झूमि कंचन डार सी.. [4] - श्री ध्रुवदास जी, बयालिस लीला, शृंगार शत 1 (34)