खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी
Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास
Verse 210 of 268
(कवित्त)
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी,
उड़त गुलाल अनुराग कौ सुरंग री। [1]
मृदु मुसकानि उर फूल एई फूल भये,
हाव-भाव सौंधे भींजे सोहैं अँग-अंग री॥ [2]
नैननिं की चितवनि छिरकनि प्रेम-नीर,
सींचत हैं पिय-हिय भरी रस-रंग री। [3]
‘हित ध्रुव’ भींजे सुख बारिध विलास हॉँस,
सोई सुख देखैं सखी दिनहिं अभंग री॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.21)
(कविता) बसंत होरी खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी, उड़त गुलाल अनुराग कौ सुरंग री। [1] आपके फूल की फीकी मुस्कान का मतलब है कि यह फूलों से भरा है, भावनाएँ मीठी-सुगंधित हैं, वैसे ही शरीर के अंग.. [2] नन्निन की चेतावनी प्रेम-रहित, पानीदार और भारी सार और रंगों से छिड़की हुई है। [3] 'हित ध्रुव' भींजे सुख बारिध विलास स्वान, सोइ सुख देखैं सखी दिनहिं अभंग री.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत (3.21)