फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 209 of 268

फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते, फूलनि-फूलनि देखत आवैं। [1] मनौं छबि के विवि चंद अनंद सौं, मंदहि-मंद मिले सुर गावैं॥ [2] नूपुर भूषन की झनकार, सखी सुनि कैं चहुँ ओर तैं धावैं। [3] रूप-सुधा रस प्रेम सुरंगहि, नैंन चकोरनि कौं 'ध्रुव’ प्यावैं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (2.37) चलिए फुलानी कुंज, देखेंगे फुलानी-फुलानी. [1] मनौं छवि के विवि चंद आनंद सौं, राग मंदाही-मांड गाऊं.. [2] नूपुर भूषण की झंकार, साखी क्यों सुनूं या दौड़ूं. [3] 'ध्रुव' से कौन प्रेम करेगा जो सौंदर्य की सुंदरता और प्रेम की सुरंग से प्रेम करेगा? [4] - श्री ध्रुव दास, बयालिस लीला, श्रृंगार शत (2.37)
कुँवरि-कुँवर दोउ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान।खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी