वृन्दाविपिन प्रणाम करि

Bayalis Leela — श्री ध्रुवदास

Verse 244 of 268

प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी, प्रेमही के रंग बोरी सोभा कही जात है। [1] एक प्रान एक वैस एक ही सुभाव चाव, एक बात दुहुँनि के मनहिं सुहात है॥ [2] एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे, एक एक बीरी दोऊ खंडि - खंडि खात हैं। [3] एक रस एक प्रान एक दृष्टि 'हित ध्रुव', हेरि हेरि बढ़ चौंप क्यों हूँ न अघात हैं॥ [4] - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (16) प्रियतमा को गोरी, रसीली और रंग-बिरंगी जोरी कहते हैं, प्रेमी की रंग-बिरंगी बोरी को सोभा कहते हैं। [1] दो लोगों के दिलों में एक जैसी जिंदगी, एक जैसा प्यार और जुनून, एक जैसी अच्छी बात होती है.. [2] एक बगीचा, एक बिस्तर, पत्तों से ढका बैठा एक, टूटे हुए अक्षरों का एक जोड़ा। [3] एक रस, एक जीवन, एक दृष्टि 'हिट ध्रुव', हेरी हेरी बढ़ चोंप, मैं आठवां क्यों नहीं.. [4] - श्री ध्रुवदास, बयालिस लीला, शृंगार शत 2 (16)
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